August 30, 2018

महाकवि सूरदास

स्मरणीय संकेत

जन्म – सं 1478 ई०
जन्म-स्थान – रुनकुता ( रेणुका )
गुरु – बल्लभाचार्य |
काव्यगत – विशेषताएँ – शृंगार और वात्सल्य चित्रण में अद्वितीय , संगीत का मधुर पुट , अलंकारों का स्वाभाविक प्रयोग |
भाषा – साहित्यक कोमलकान्त ब्रजभाषा |
शैली – गीति मुक्तक शैली |
रचनाएँ – सूरसागर , सूरसारावली , साहित्य लहरी |
जाति – सारस्वत ब्राह्मण |
निवास – मथुरा , श्रीनाथ मंदिर |
मृत्यु – सं 1583 ई०

महाकवि सूरदास का जीवन परिचय

जीवन परिचय –  भक्त शिरोमणि सूरदास हिंदी साहित्य गगन के सूर्य तथा ब्रजभाषा के सर्वश्रेष्ट कवि है । इनके जन्मकाल के विषय में विद्वानों में मतभेद है । सूर के जीवन के विषय में अभी तक जो खोज हुई है उसके आधार पर सूर का जन्म बल्लभाचार्य जी के दस दिन बाद वैसाख शुक्ल पंचमी सं० 1535 वि० ( सन् 1478 ई० ) दिन मंगलवार को स्वीकार किया जाता है । इनकी मृत्यु सं० 1640 वि० ( सन् 1583 ई० ) में हुई मानी जाती है । जन्म और मृत्यु की इन्ही तिथियों को दीनदयाल गुप्त ने ‘ निज वार्ता ‘ के आधार पर प्रमाणित किया है । सूर के जन्म स्थान के विषय में भी विद्वानों में मतभेद है । पं० रामचंद्र शुक्ल तथा डॉ० श्यामसुन्दर दास सूर का जन्म आगरा से मथुरा जाने वाली सड़क पर स्थित रुनकुता ( रेणुका ) नामक गाँव में सारस्वत ब्राह्मण परिवार में मानते है किन्तु प्राणनाथ कृत ‘ अष्टसखामृत ‘ के आधार पर इनका जन्म स्थान दिल्ली से थोड़ी दूर ‘ सीही ‘ नामक ग्राम ठहरता है । कुछ विद्वान् सूर को पृथ्वीराज के दरबारी कवी चन्दबरदाई का वंशज ब्रह्मभट्ट मानते है । सूर्यदास जी जन्मान्ध थे । उनके प्रमाणों द्वारा उनकी जन्मान्धता सिद्ध हो चुकी है ।

साहित्यिक परिचय –  सूरदास जी अपने प्रारम्भिक जीवन में राम के भक्त थे । सन् 1517 ई० में उनकी स्वामी बल्लभाचार्य जी से भेंट हुई और वे उनके शिष्य बन गये । बल्लभ-सम्प्रदाय में दीक्षित होकर सूर कृष्ण के अनन्य भक्त बन गये । तब से ही ये श्रीनाथ जी के मंदिर में रह कर कृष्णभक्ति के पद गाने लगे । यही रहते हुए सूर ने स्वामी बल्लभाचार्य जी के आदेशानुसार श्रीमदभागवत के आधार पर कृष्ण चरित को पदों में वर्णन किया । भागवत के दशम स्कन्ध को लेकर सूर ने कृष्ण के बाल चरित्र के जो मनोरम चित्र अपने पदों में अंकित किये , वे भक्तों तथा रसिकों , दोनों के ही लिए महत्वपूर्ण सिद्ध हुए । बल्लभाचार्य जी की मृत्यु के पश्चात उनके पुत्र बिट्ठलनाथ ने ” अष्टछाप ” की स्थापना की | अष्टछाप के कवियों में सूर का स्थान सर्वोपरि था | सं 1583 ई० के लगभग , जब ये ‘ परसौलि ‘ गांव में रह रहे थे , इनका स्वर्गवास हो गया | 

साहित्यिक-कृतियाँ –  नागरी प्रचारिणी सभा की खोज के अनुसार सूर की रचनाओं की संख्या 25 है | किन्तु अभी तक प्रामाणिक रूप से सूर के केवल तीन ग्रन्थ उपलब्ध हो पाये है – ‘ सूरसागर ‘ , ‘ सूरसारावली ‘ और ‘ साहित्य-लहरी ‘ | सूर की प्रमुख रचना ‘ सूरसागर ‘ है , जिसमे 12 अध्याय है | इस ग्रन्थ में विनय , भक्ति , विष्णु के अवतारों तथा अन्य पौराणिक कथाओं का निरूपण किया गया है | ‘ सूरसागर ‘ के पदों की संख्या सवा लाख बतायी जाती है , जिनमे से अब तक केवल छः-सात हजार पद ही प्राप्त हो पाये है | ‘ सूरसारावली ‘ में दो-दो पंक्ति के 1106 छंद है | ‘ साहित्य – लहरी ‘ मे दृष्टकूट पदों का संग्रह है | इसमें रस , अलंकार , नायिका भेद आदि का वर्णन किया गया है |