August 30, 2018

सन्त कबीर दास

स्मरणीय संकेत

जन्म – सं 1398  ई०
माता – कोई विधवा
पालन-पोषण – नीरू-नीमा जुलाहा दम्पति द्वारा |
गुरु – रामानन्द
साहित्यिक-विशेष्ता – ज्ञानाश्रयी निर्गुण भक्ति काव्य के प्रतिनिधि एवं प्रवर्तक कवि |
भाषा – सधुक्कड़ी , पंचमेल खिचड़ी |
शैली – दोहा तथा पद शैली |
रचनाएँ – बीजक ( साखी , सबद , रमैनियाँ )
मृत्यु – सं 1518  ई०

सन्त कबीरदास का जीवन परिचय

जीवन-परिचय –  ‘कबीर कसौटी’ के अनुसार महात्मा कबीर का जन्म ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा , सं० 1455 ( सन् 1398 ई० ) में हुआ था |

‘‘ चौदह सौ पचपन साल गये , चन्द्रवार इक ठाठ भये |
जेठ सुदी बरसायत को , पूरनमासी प्रकट भये || ‘‘

कबीर की मृत्यु के विषय में यह दोहा प्रसिध्द है –

‘‘ पन्द्रह सौ पिछहत्तरा , कियो मगहर को गौन |
माघ सुदि एकादशी , मिल्यौ पौन सौ पौन || ‘‘

इस दोहे के आधार पर कबीर की मृत्यु-तिथि सन् 1518 ईव बैठती है और उनकी आयु लगभग 120 वर्ष जीने के बाद सिद्ध होती है । इन तिथियों को प्रमाणित करने के लिए यद्यपि और कोई प्रमाण नहीं है तथापि अब तक उपलब्ध सामग्री के आधार पर इनके ठीक होने की ही सम्भावना है ।

कबीर का जन्म –  कबीर के जन्म के विषय में मतभेद है । कुछ विद्वानों का कहना है कि कबीर को किसी विधवा ने जन्म दिया था । लहरतारा गाँव के निकट तालाब के किनारे पड़े इस बालक को नीरू और नीमा नामक जुलाहा दम्पति ने उठाकर पालन-पोषण किया ।

कबीर पंथियों की धारणा के अनुसार अति रमणीय समय में जबकि प्रकृति ने नभमंडल को मेघमाला से आच्छादित कर रखा था , सौदामिनी अपने प्रकाश से आकाश को प्रकाशित कर रही थी , पक्षी अपने कलरब से स्वागत गान कर रखा था , ऐसे समय में लहरतारा तालाब में खिले हुए कमल-पुट में एक दिव्य पुरुष प्रकट हुआ जो ‘कबीर‘ नाम से विख्यात हुआ ।

शिक्षा – कबीर ने स्वयं कहा है –

‘‘मसि कागद छूयौ नहीं , कलम गहयौ नहीं हाथ ।”

अनपढ़ होते हुए भी कबीर का ज्ञान बहुत विस्तृत था । साधु- सन्तों और फकीरों की संगति में बैठकर उन्होंने वेदान्त , उपनिषद और योग का पर्याप्त ज्ञान प्राप्त कर लिया था । सूफी फकीरों की संगति में बैठकर इन्होंने इस्लाम धर्म के सिद्धान्तों की भी काफी जानकारी कर ली थी । देशाटन के द्वारा उन्हें बहुत अनुभव हो गया था ।

गृहस्थ – जीवन –  कबीर का विवाह एक बनखंडी बैरागी की लड़की ‘लोई ‘ के साथ हुआ द्य कबीर ने स्वयं स्वीकार किया है –

‘‘ नारी तो हमहू करि , पाया नहीं विचार |
जब जानी तब परिहरि , नारी बड़ा विकार ||‘‘

कबीर के घर एक पुत्र तथा एक कन्या ने जन्म लिया द्य इनके पुत्र का नाम ‘‘ कमाल ‘‘ और पुत्री का नाम ‘‘ कमाली ‘‘ था द्य पुत्र के धन संचय में लगे रहने के कारण कबीर उससे रुष्ट रहते थे –

‘‘ बूढ़ा वंश कबीर का , उपजा पूत कमाल |
हरी का सुमिरन छाँडि कै , घर ले आया माल || “

कुछ लोग लोई को कबीर की शिष्या कहते है द्य हो सकता है की ज्ञान हो जाने के बाद गृहस्थी जीवन का त्याग कर देने के बाद लोई उनकी शिष्या बन गयी हो |

कबीर मृत्यु के समय मगहर चले गये थे । जहाँ सन् 1518 ई० में इनकी जीवनलीला समाप्त हो गयी । वास्तव में कबीर के जीवन के विषय में अभी तक बहुत कुछ संदिग्ध है । उनके जीवन के विषय में अभी भी पर्याप्त खोज की आवश्यकता है ।

साहित्यिक- कृतियाँ – कबीर अनपढ़ थे । उन्होंने स्वयं किसी काव्य की रचना नहीं की । उपदेश देते हुए उन्होंने जिन दोहों अथवा पदों का प्रयोग कर दिया , उन्ही को उनके धर्मदास आदि शिष्यों ने संगृहीत कर लिया । बस वही कबीर का काव्य है । ‘ बीजक‘ कबीर की रचनाओं का संग्रह है जिसके सबद , साखी , और रमैनी तीन भाग है । ‘ कबीर ग्रन्थावली ‘ तथा ‘ कबीर रत्नावली ‘ नाम से भी कबीर की कविताओं के संग्रह प्रकाशित हुए है ।